हिंदी के विकास में कुछ कमिटी बनी जिनका मुख्या उद्देस्य राष्ट्र की बोली क विकास का है, क्या ये केवल इन तक ही सीमित है , भारत ऐसा देश है जन्हा रास्ट्रभासा का दर्जा तो हिंदी को मिला है पर, अनेको परीक्षाओ में इंग्लिश को अनिवार्य किया गया है क्या ये न्याय संगत,
upsc की सभी परीक्षाओ में इंग्लिश को प्राथमिकता दी जाती है जिससे जो छात्र हिंदी माध्यम क होते है वो सफल नही हो पाते और वो अयोग्य घोसित हो जाते है, क्या ये न्याय संगत है, हा हिंदी ग्लोबल लैंग्वेज नही है तो क्या हुआ चीन की तरह हमें भी अपनी भासा को बढ़ावा देना चाइये , सभी विचारो आदानं प्रदान का माद्यम हिंदी होना चाहिए, इंग्लिश को उसकी योग्यता का सर्टिफिकेट नही समझना चाहिए, दोस्तों जो दीप घर को रोशन न कर पाये, उससे जग रोशन की क्या उम्मीद लगाये, मतलब यही है हमें हिंदी क प्रयोग में सर्म का अनुभव नही करना चाहिए इंग्लिश तो पराई कब दगा दे जाएगी पैर हिंदी तो अपनी साथी है दूर तक साथ निभाएगी , अपनी राय दीजिये,

